पूजा और आरू की अधूरी मोहब्बत
गाँव की कच्ची गलियों में दो नन्हीं परछाइयाँ दौड़ती-भागती दिखाई देती थीं – पूजा और आरू।
सुबह सूरज उगते ही दोनों घर से निकल जाते और पूरे दिन खेतों, तालाब और बगीचे में खेलते।
पूजा – "आरू, देख मैं तुझसे ऊँचा झूला झूल रही हूँ!"
आरू हँसते हुए – "अरे तू तो गिर जाएगी, रुक मैं धक्का लगाता हूँ।"
उनकी हँसी की गूँज पूरे गाँव में फैल जाती।
स्कूल में भी दोनों साथ बैठते। जब पूजा कॉपी भूल जाती तो आरू अपनी कॉपी उसके आगे रख देता।
जब आरू गणित का सवाल नहीं बना पाता तो पूजा झुँझलाकर कहती –
"तू तो बिलकुल पागल है, कुछ पढ़ता ही नहीं!"
और फिर दोनों खिलखिलाकर हँस पड़ते।
गाँव वाले अकसर कहते –
"ये दोनों दोस्त नहीं, जैसे एक-दूसरे की जान हैं।"
समय बीता, दोनों किशोरावस्था में कदम रख चुके थे।
अब उनकी दोस्ती धीरे-धीरे मोहब्बत का रूप ले रही थी।
जब पूजा नदी किनारे कपड़े धोने जाती तो आरू दूर से उसे देखता रहता।
दिल में अनकहे जज़्बात उमड़ते, लेकिन जुबां खामोश रहती।
एक दिन पूजा ने छेड़ते हुए कहा –
"आरू, तू हमेशा मेरे साथ ही क्यों रहता है? तेरे और भी दोस्त तो हैं।"
आरू ने मुस्कुराकर कहा –
"क्योंकि तेरे बिना मेरा मन कहीं लगता ही नहीं। तू है तो सबकुछ है।"
पूजा शरमा गई और चुप हो गई, लेकिन उसकी आँखें सबकुछ कह रही थीं।
बारहवीं की परीक्षा के बाद गाँव में मेला लगा।
झूले, मिठाइयाँ और रंग-बिरंगे कपड़ों से गाँव सज गया था।
यही मौका देखकर आरू ने पूजा को झूले के पास रोक लिया।
उसके दिल की धड़कनें तेज़ थीं, हाथ काँप रहे थे।
आरू –
"पूजा… मैं तुझसे कुछ कहना चाहता हूँ। बचपन से तू मेरी सबसे अच्छी दोस्त रही है। लेकिन अब तू सिर्फ दोस्त नहीं रही। तू मेरे दिल की धड़कन है। क्या तू मेरी जिंदगी भर की साथी बनेगी?"
पूजा की आँखों में आँसू आ गए।
उसने धीरे से कहा –
"हाँ आरू… मैं भी तुझसे वही महसूस करती हूँ। सात जन्मों तक मैं तेरी ही रहना चाहती हूँ।"
दोनों ने हाथ पकड़कर आसमान की तरफ देखा और तारे देखकर कसम खाई –
"हम चाहे जहाँ भी हों, हमारी साँसें एक-दूसरे के साथ ही थमेंगी।"
अब हर पल में बस प्यार था।
गुपचुप खेतों में मिलना, खत लिखना, आँखों से बातें करना – यही उनकी दुनिया थी।
आरू अकसर कहता –
"एक दिन मैं बड़ा आदमी बनूँगा, तुझे शहर ले जाऊँगा और तेरे सपनों का घर बनाऊँगा।"
पूजा मुस्कुराकर जवाब देती –
"मुझे कुछ नहीं चाहिए, बस तू चाहिए।"
दोनों ने मिलकर भविष्य के सपने सजाए – शादी, परिवार और सात जन्मों तक साथ रहने का।
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था।
आरू को पढ़ाई के लिए शहर जाना पड़ा।
जाते वक्त उसने पूजा से कहा –
"थोड़ा वक्त लगेगा, लेकिन मैं लौटकर तुझे दुल्हन बनाकर घर लाऊँगा।"
पूजा ने हाथ पकड़कर कहा –
"मैं तेरा इंतजार करूँगी, चाहे कितने भी साल क्यों न लग जाएँ।"
पर अचानक पूजा के घरवालों ने उसकी शादी कहीं और तय कर दी।
पूजा ने लाख मिन्नतें कीं, कहा – "मेरा दिल किसी और के पास है।"
लेकिन परिवार की इज़्ज़त, समाज का दबाव – सबके आगे उसकी आवाज़ दब गई।
बिना आरू को बताए पूजा की शादी हो गई।
जब आरू को खबर मिली, उसका दिल चकनाचूर हो गया।
वो मंदिर के आँगन में बैठकर फूट-फूटकर रोया।
"तूने कहा था पूजा… सात जन्मों तक मेरा साथ दोगी। फिर क्यों तोड़ा वादा?"
उसके हाथ में पूजा का पुराना खत था, जिसमें लिखा था –
"आरू, तू मेरी आखिरी मंज़िल है।"
लेकिन अब मंज़िल उससे छिन चुकी थी।
आरू ने तय कर लिया – वो कभी किसी और से शादी नहीं करेगा।
पूजा शादी के बाद भी आरू को भूल नहीं पाई।
जब-जब वो अकेली होती, आँचल में चेहरा छुपाकर रोती।
उसका पति उसे सबकुछ देता, लेकिन दिल में एक खालीपन था, जो कभी भरा ही नहीं।
वो खालीपन सिर्फ आरू से भरा जा सकता था।
आरू ने भी सारी उम्र पूजा की यादों के सहारे गुज़ार दी।
उसके लिए पूजा ही उसकी दुनिया थी।
कई सालों बाद एक दिन मंदिर में दोनों का सामना हो गया।
आँखों में हज़ारों सवाल थे, पर जुबां पर खामोशी।
आरू ने टूटी आवाज़ में कहा –
"तूने मुझसे वादा किया था पूजा… सात जन्मों तक।"
पूजा की आँखें भर आईं –
"हाँ आरू… ये जन्म मेरा तुझसे छिन गया। लेकिन आने वाले हर जन्म में मैं तुझे ढूँढूँगी और तुझसे ही शादी करूँगी।"
दोनों की आँखों से आँसू बहे, और मंदिर की घंटियों की आवाज़ में उनका दर्द समा गया।
निष्कर्ष
यह कहानी सिर्फ मोहब्बत की नहीं, बल्कि अधूरी मोहब्बत की है।
पूजा और आरू का रिश्ता हमें सिखाता है कि सच्चा प्यार कभी खत्म नहीं होता।
चाहे समाज रोक ले, हालात बदल जाएँ – लेकिन दिल की गहराइयों में वो हमेशा ज़िंदा रहता है।
आरू और पूजा भले ही इस जन्म में एक न हो पाए, लेकिन उनके दिल ने सात जन्मों का वादा कर लिया था।

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