“सोऩा और आरू – एक अधूरी दास्तान”

                   

           सोऩा और आरू – एक अधूरी दास्तान

   


गाँव की एक संकरी गली थी। कच्चे घर, आँगन में टंगे कपड़े, बच्चों की खिलखिलाहट, और धूल से सनी पगडंडियाँ। इसी गली में रहती थी सोऩा – बड़ी-बड़ी आँखों वाली, मासूम-सी लड़की। उसकी हँसी में ऐसी मिठास थी कि जिसे सुनकर हर कोई मुस्कुरा देता। वहीं पास के घर में रहता था आरू, जो हमेशा शरारतों और खेलों में आगे रहता था।

बचपन से ही सोऩा और आरू की दोस्ती गहरी थी। मोहल्ले के बाकी बच्चे जब लुकाछिपी खेलते, तो ये दोनों अक्सर एक-दूसरे के साथ बैठकर मिट्टी के घर बनाते। आरू को सोऩा के साथ खेलना सबसे ज़्यादा अच्छा लगता, और सोऩा भी हर छोटी-बड़ी बात उसी को बताती।

गाँव वाले कहते थे – “ये दोनों तो जैसे जन्म-जन्म के साथी हैं।”
लेकिन तब तक किसी को भी अंदाज़ा नहीं था कि ये मासूम दोस्ती एक दिन प्यार में बदल जाएगी।

एक बार की बात है, स्कूल जाते वक्त सोऩा का चप्पल टूट गया। वो उदास होकर रास्ते के किनारे बैठ गई। बाकी बच्चे आगे बढ़ गए, लेकिन आरू वहीं रुक गया। उसने अपनी चप्पल उतारी और सोऩा की तरफ बढ़ाकर बोला –
“ये ले, तू मेरी चप्पल पहन ले, मैं नंगे पैर चला जाऊँगा।”

सोऩा ने हँसते हुए कहा –
“पागल है क्या? तुझे चोट लग जाएगी।”

आरू ने शरारती अंदाज़ में जवाब दिया –
“तेरे पैरों को चोट लगे, ये मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता।”

उस दिन सोऩा की आँखों में पहली बार अलग-सी चमक थी। वो मासूम दोस्ती धीरे-धीरे गहरी होने लगी थी

समय बीतता गया। अब दोनों किशोर हो गए थे। स्कूल से कॉलेज का सफ़र शुरू हो गया था। सोऩा अब और भी ख़ूबसूरत हो गई थी – उसकी मुस्कान जैसे किसी भी अंधेरे को रोशन कर दे। वहीं आरू एक जिम्मेदार और समझदार लड़के के रूप में सबके बीच पहचाना जाने लगा था।

मोहल्ले में जब भी कोई त्योहार आता, तो दोनों हमेशा साथ नज़र आते। छत पर पतंग उड़ाना हो या होली के रंगों में भीगना, सोऩा और आरू की जोड़ी हर जगह सबसे अलग चमकती।

लेकिन अब उनकी नज़रें बदलने लगी थीं। वो दोस्ती वाली बेफ़िक्री अब धीरे-धीरे मोहब्बत की परछाई में बदल रही थी।


पहली मोहब्बत की धड़कन

एक शाम का वक़्त था। बारिश हो रही थी। गली में मिट्टी की ख़ुशबू फैली हुई थी। सोऩा छत पर खड़ी होकर बारिश की बूंदों को महसूस कर रही थी। अचानक पीछे से आरू आ गया।

“बारिश में भीग जाएगी तो बीमार पड़ जाएगी,” आरू ने कहा।

सोऩा मुस्कुराई –
“बीमारी से डर नहीं लगता, ये बारिश की बूंदें तो जैसे सारी परेशानियाँ धो देती हैं।”

आरू कुछ पल उसे देखता रह गया। उसका दिल तेज़ धड़कने लगा। तभी सोऩा ने पूछा –
“क्या हुआ? ऐसे क्यों देख रहा है?”

आरू घबराते हुए बोला –
“कुछ नहीं… बस तू बहुत अच्छी लग रही है।”

ये सुनकर सोऩा शरमा गई। उसकी गालों पर लाली आ गई, और आरू के दिल में प्यार की कली पूरी तरह से खिल गई।


इज़हार-ए-मोहब्बत

कुछ दिन बाद आरू ने हिम्मत जुटाई। वो सोऩा को पुराने बरगद के पेड़ के नीचे बुलाया, जहाँ दोनों अक्सर खेला करते थे। हवा हल्की चल रही थी, और चारों तरफ़ सन्नाटा था।

आरू ने काँपती आवाज़ में कहा –
“सोऩा… बचपन से हम हमेशा साथ रहे हैं। तू मेरी सबसे अच्छी दोस्त है। लेकिन अब… अब मैं तुझे सिर्फ़ दोस्त की तरह नहीं देख पाता। मैं तुझसे प्यार करता हूँ।”

सोऩा की आँखें बड़ी हो गईं। उसने कुछ पल आरू को देखा, फिर उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।
“इतना सोच क्यों रहा था? मैं भी तुझसे प्यार करती हूँ, आरू।”

आरू की खुशी का ठिकाना न रहा। वो वहीं पेड़ के नीचे सोऩा का हाथ पकड़कर बैठ गया।
उस पल ऐसा लग रहा था जैसे पूरी दुनिया सिर्फ़ उनकी हो गई हो।


सोऩा का घर बाहर से भले ही एक साधारण-सा दिखता था, लेकिन अंदर का माहौल हमेशा तूफ़ानी रहता। उसके माता-पिता उसे अक्सर बोझ की तरह देखते। माँ अक्सर ताने देती –
“तू लड़की है, तेरे सिर पर कौन सा ताज रखा है? जल्दी-जल्दी बड़ा हो जा, फिर किसी के घर भेज देंगे।”

पिता ज़्यादातर चुप रहते, लेकिन उनकी चुप्पी भी कभी-कभी सोऩा को गहरे घाव दे जाती।
गाँव में जब भी कोई रिश्तेदार आता, माँ सोऩा को इशारे-इशारे में सुनाती –
“हमें तो बस बोझ उठाना है, पाल-पोस कर किसी और को देना है।”

इन सबके बीच सोऩा का एक ही सहारा था – आरू।

दिनभर की डाँट-फटकार के बाद जब सोऩा अपने छोटे-से कमरे में अकेली बैठती, तो खिड़की से आसमान को देखती। उसे लगता जैसे सितारे उससे बातें कर रहे हों।
उसे अपनी हालत पर रोना आता, लेकिन फिर याद आती आरू की बातें –
“तू जब हँसती है ना सोऩा, तो मुझे लगता है पूरी दुनिया रोशन हो गई।”

बस यही सोचकर वो आँसू पोंछकर मुस्कुरा देती।


एक दिन सोऩा बहुत रो रही थी। उसकी माँ ने छोटी-सी बात पर उसे जोर से मारा था। आँखें लाल थीं और गाल पर उभरे निशान अभी भी साफ़ दिखाई दे रहे थे। उसी वक्त आरू उसके आँगन में आया।

“क्या हुआ सोऩा? तू ऐसे क्यों रो रही है?”

सोऩा ने चुपचाप अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।
आरू ने धीरे से उसका चेहरा पकड़ा और बोला –
“ये सब कब तक सहती रहेगी? मैं तुझसे वादा करता हूँ, एक दिन तुझे इस घर से दूर ले जाऊँगा। हम दोनों अपनी एक नई दुनिया बसाएँगे, जहाँ सिर्फ़ तू और मैं होंगे।”

सोऩा काँपती आवाज़ में बोली –
“आरू, मैं भाग नहीं सकती। माँ-बाप को छोड़कर चली गई तो लोग उन्हें ताने देंगे। मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से वो और बदनाम हों।”

आरू की आँखों में आँसू थे। उसने कहा –
“लेकिन मैं तुझे दुख में नहीं देख सकता।”

उस पल दोनों के बीच एक गहरी चुप्पी छा गई।


कुछ महीनों बाद, अचानक सोऩा घर से ग़ायब हो गई। उसने किसी को कुछ नहीं बताया – यहाँ तक कि आरू को भी नहीं।

जब आरू को खबर मिली, तो उसका दिल टूट गया। वो पागलों की तरह हर जगह ढूँढने लगा।
कभी स्टेशन पर, कभी मंदिर में, कभी पुरानी गली में – लेकिन सोऩा कहीं नहीं थी।

दिन हफ्तों में बदल गए। फिर एक दिन आरू के पास फोन आया।
फोन पर सोऩा की आवाज़ थी – कांपती हुई, पर जानी-पहचानी।
“आरू…”

आरू की आँखों से आँसू बहने लगे। वो चीख पड़ा –
“तूने ऐसा क्यों किया सोऩा? मुझे बताए बिना क्यों चली गई? मैं तेरे बिना कैसे जीऊँगा?”

सोऩा चुप रही। फिर धीरे से बोली –
“मजबूरी थी आरू… मैं चाहकर भी तुझसे सब नहीं कह पाई। लेकिन तू हमेशा मेरे दिल में रहेगा।”

उस दिन दोनों ने घंटों बात की। रोते-रोते थक गए, लेकिन कोई रास्ता न मिला।


अधूरी मुलाकात

इसके बाद जब भी सोऩा फोन करती, आरू एक ही बात कहता –
“थोड़ा और वक्त दे, मैं पैसे कमा लूँ, फिर तुझे अपने पास ले आऊँगा। मैं तुझे दुखी नहीं देख सकता।”

सोऩा बस चुप हो जाती।
धीरे-धीरे उनके बीच की बातें भी कम होने लगीं। दोनों की ज़िंदगी अलग राहों पर बढ़ रही थी, लेकिन दिल अब भी एक-दूसरे के लिए धड़कते थे।

 

समय धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया। सोऩा और आरू की बातें अब बहुत कम हो चुकी थीं। वो मासूम दोस्ती और गहरा प्यार अब सिर्फ़ फोन कॉल्स और अधूरी चुप्पियों तक सिमट कर रह गया था।

आरू हर रोज़ मेहनत करता – छोटे-छोटे काम पकड़ता, दिन-रात पसीना बहाता। उसका बस एक ही सपना था – इतना कमा ले कि सोऩा को अपने पास बुला सके। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था।


एक दिन आरू को अचानक खबर मिली –
“सोऩा की शादी हो गई है।”

उसके कानों में ये शब्द हथौड़े की तरह गूंजे।
दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
“न… ये झूठ है, ये सच नहीं हो सकता।”

लेकिन जब सच सामने आया तो उसकी आँखों में आँसू छलक पड़े। सोऩा ने बिना बताए, बिना विदाई दिए, किसी और का हाथ थाम लिया था।


सोऩा की नई ज़िंदगी

सोऩा अब विनु की पत्नी थी – जो शहर की एक कंपनी में सुपरवाइज़र था। विनु जिम्मेदार और सुलझा हुआ इंसान था। धीरे-धीरे सोऩा और विनु की नज़दीकियाँ बढ़ीं।

एक साल के अंदर सोऩा को एक बेटा हुआ। उसका सारा वक्त अब परिवार और बच्चे की देखभाल में गुजरने लगा।
वो अब व्यस्त थी, उसके चेहरे पर मुस्कान थी, लेकिन दिल के किसी कोने में आरू का नाम अब भी लिखा था।


आरू की तन्हाई

उधर आरू अब भी मेहनत कर रहा था। उसके हाथों में छाले थे, लेकिन दिल में उम्मीद जिंदा थी।
रात को अकेले कमरे में बैठकर वो सोऩा की यादों में खो जाता।
बरगद का पेड़, बारिश की वो शाम, और वो पहली मुस्कान – सब कुछ उसकी आँखों के सामने तैर जाता।

कभी-कभी वो सोचता –
“क्या सोऩा मुझे भूल गई होगी? क्या उसने मुझे कभी सच में चाहा भी था?”

लेकिन अगले ही पल उसका दिल कहता –
“नहीं… वो मुझे आज भी याद करती होगी।”


वक़्त का पहिया दोनों को और दूर ले गया। सोऩा अब एक माँ, पत्नी और बहू के फ़र्ज़ निभा रही थी। और आरू अब भी एक मेहनती मजदूर था – जो सपनों की थकान अपने दिल में ढो रहा था।

उनके बीच अब सिर्फ़ खामोशी थी।
प्यार अब भी जिंदा था, लेकिन अधूरा।
उनका रिश्ता एक ऐसी किताब बन गया था, जिसके आख़िरी पन्ने कभी लिखे ही नहीं गए।


साल बीतते गए। अब सोऩा की ज़िंदगी पूरी तरह से बदल चुकी थी।
वो एक ज़िम्मेदार पत्नी और एक माँ थी। उसके बेटे की खिलखिलाहट में उसे अपनी सारी खुशियाँ नज़र आतीं। विनु उसके लिए एक मजबूत सहारा बन चुका था। उसकी आँखों में अब सुकून था, लेकिन दिल के किसी कोने में एक परछाई अब भी थी – आरू की परछाई।


आरू की मेहनत और तन्हाई

उधर आरू अब भी अपने सपनों के लिए मेहनत कर रहा था। उसने गाँव छोड़कर शहर का रुख़ किया। छोटी-सी नौकरी से शुरुआत की, फिर धीरे-धीरे कामयाबी की सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।

लेकिन उसके पास सबकुछ होने के बावजूद, उसका दिल खाली था।
हर रात थककर जब वो बिस्तर पर लेटता, तो यादें उसे जकड़ लेतीं –
वो बरगद का पेड़, वो बारिश वाली शाम, सोऩा की हँसी… सब उसकी आँखों के सामने ज़िंदा हो जाता।

कभी-कभी वो अपने आप से कहता –
“काश! उस दिन सोऩा मेरे साथ चल पाती। आज हमारी भी एक दुनिया होती।”

लेकिन किस्मत ने उनकी कहानी को आधा ही रहने दिया था।


अधूरी मुलाकात

कई साल बाद एक दिन सोऩा अपने बेटे को लेकर बाज़ार गई। अचानक उसकी नज़र सामने खड़े आरू पर पड़ी।

समय ने दोनों को बदल दिया था –
सोऩा अब एक परिपक्व औरत थी, और आरू अब मेहनत से तराशा हुआ आदमी।

दोनों की आँखें मिलीं। पलभर को समय रुक गया।
लेकिन फिर सोऩा ने अपने बेटे का हाथ पकड़ा और नज़रें झुका लीं।

आरू बस मुस्कुराया। उस मुस्कान में दर्द भी था और प्यार भी।
उसने कुछ नहीं कहा, बस मन ही मन बोला –
“तू खुश है, बस यही मेरे लिए काफी है।”


आख़िरी ख़्वाब

उस रात आरू ने आसमान की तरफ देखा। तारे टिमटिमा रहे थे।
उसने धीरे से फुसफुसाया –
“सोऩा… मेरा प्यार कभी अधूरा नहीं था। ये बस अधूरी कहानी थी। तू जहाँ भी है, खुश रहना। बस यही मेरी दुआ है।”

उसकी आँखों से आँसू बहते रहे, लेकिन दिल में एक सुकून था।
क्योंकि सच्चा इश्क़ हमेशा पूरा होना ज़रूरी नहीं… कभी-कभी अधूरा रहकर भी वो ज़िंदगी से बड़ा बन जाता है।


अंत

सोऩा अपनी दुनिया में व्यस्त रही, और आरू अपने अधूरे इश्क़ को दिल में संजोकर आगे बढ़ता रहा।
दोनों की राहें अलग थीं, लेकिन यादों के पुल से हमेशा जुड़ी रहीं।

उनकी कहानी का अंत भले ही साथ न हुआ हो,
लेकिन मोहब्बत…वो हमेशा जिंदा रही।

                                                                                                                        story |Aaru aur sona ki                                                                                                                                                adhuri dastaan

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