दोस्ती का नाटक
छोटे से कस्बे में दो लड़के रहते थे – राहुल और अमित। दोनों की उम्र लगभग बराबर थी, पढ़ाई भी एक ही कॉलेज में करते थे। देखने में तो उनकी जोड़ी किसी फिल्मी हीरो-हीरोइन से कम नहीं लगती थी – जहाँ राहुल होता, वहाँ अमित ज़रूर दिखता, और जहाँ अमित जाता, राहुल पीछे-पीछे पहुँच जाता।
राहुल सीधा-सादा, मेहनती और भावुक किस्म का लड़का था। उसकी सबसे बड़ी कमजोरी यही थी कि वो दूसरों की मदद करने से पीछे नहीं हटता था। अगर कोई उससे कह दे कि "भाई, मुझे ko तेरी मदद चाहिए," तो राहुल बिना सोचे-समझे अपने सारे काम छोड़कर तैयार हो जाता।
दूसरी तरफ़ अमित था – शरारती, चालाक और थोड़ा-सा आलसी। उसे मेहनत से सख्त नफ़रत थी। क्लास का असाइनमेंट हो या घर का कोई छोटा-मोटा काम – अमित हमेशा कोई न कोई बहाना बना लेता। और उसकी किस्मत देखो कि उसका हर बहाना राहुल मान भी लेता।
कॉलेज का पहला हफ़्ता था। क्लास में टीचर ने असाइनमेंट दिया – "दो हफ़्ते के अंदर एक प्रोजेक्ट तैयार करना है।" सब लड़के परेशान हो गए क्योंकि काम थोड़ा मुश्किल था। राहुल ने मन ही मन ठान लिया कि चाहे जैसे भी हो, वो मेहनत करके प्रोजेक्ट तैयार करेगा।
लेकिन अमित के चेहरे पर एक चालाक मुस्कान आ गई। उसने प्रोजेक्ट के बारे में सोचना भी ज़रूरी नहीं समझा। अगले ही दिन वो राहुल के पास आया, आँखों में नकली उदासी भरकर बोला –
अमित (कमज़ोर आवाज़ में): "भाई… मुझे कल रात से बुखार है। डॉक्टर ने बोला है कि आराम कर। मैं प्रोजेक्ट कैसे कर पाऊँगा? तुझे तो पता है, मेरी तबीयत बहुत नाज़ुक है।"
राहुल तुरंत पिघल गया।
राहुल: "अरे यार, तू चिंता मत कर। तू आराम कर। मैं तेरा हिस्सा भी कर दूँगा। दोस्त किस दिन काम आता है!"
अमित ने राहत की साँस ली और मन ही मन सोचा – "कमाल है! नाटक काम कर गया। अब आराम से क्रिकेट खेलूँगा और सारा काम राहुल करेगा।"
राहुल पूरे जोश से दिन-रात प्रोजेक्ट में जुट गया। किताबें पढ़ीं, इंटरनेट से रिसर्च किया, और आखिरकार दोनों का प्रोजेक्ट शानदार बना दिया। जब क्लास में प्रोजेक्ट सबमिट हुआ, तो टीचर ने कहा –
टीचर: "वाह! राहुल और अमित, तुम दोनों का काम सबसे अच्छा है। पूरे क्लास में नंबर वन।"
राहुल खुश था, लेकिन अमित का चेहरा और भी ज्यादा चमक रहा था। जबकि उसने एक उंगली तक नहीं उठाई थी। मगर राहुल के सामने उसने मासूमियत से कहा –
अमित: "भाई, अगर तू न होता तो मैं फेल हो जाता। सच में तू ही मेरा असली दोस्त है।"
राहुल ये सुनकर और भी ज़्यादा भावुक हो गया।
समय बीतने लगा। अब ये सिलसिला रोज़ का हो गया था। कभी अमित कहता – "आज पेट दर्द है", तो कभी – "आज चक्कर आ रहे हैं।" और हर बार राहुल उसके लिए काम कर देता।
- होमवर्क राहुल करता।
- कपड़े धोने राहुल जाता।
- कमरे की सफाई राहुल करता।
- और तो और, कभी-कभी तो खाना भी राहुल बना देता था।
अमित बस मोबाइल पर गेम खेलता और राहुल से कहता –
अमित (नाटकिया अंदाज़ में): "भाई, तू न होता तो मैं कैसे जीता? तू तो भगवान का तोहफ़ा है।"
राहुल हर बार उसकी बातों में आ जाता और सोचता – "दोस्ती का मतलब ही यही है – एक-दूसरे के काम आना।"
लेकिन राहुल को ये नहीं पता था कि ये "दोस्ती" सिर्फ़ एक नाटक है।
अमित की हर बात, हर बीमारी, हर बहाना – सब दिखावा था।
धीरे-धीरे ये नाटक इतना बड़ा रूप लेने वाला था कि राहुल की ज़िंदगी पूरी तरह बदल जाएगी।
राहुल और अमित की दोस्ती अब पूरे मोहल्ले में मशहूर हो गई थी। सब कहते – “ये दोनों तो जैसे राम-लखन हैं, हमेशा साथ रहते हैं।”
लेकिन असली सच सिर्फ़ अमित जानता था।
एक सुबह का किस्सा है। राहुल जल्दी उठकर नाश्ता बना रहा था। तभी अमित करवट बदलते हुए बोला –
अमित (कमज़ोर आवाज़ में):
“भाई… आज मेरा सिर बहुत घूम रहा है। लगता है कल रात ठंडी हवा लग गई। तू आज कॉलेज चला जा, मैं आराम कर लूँगा।”
राहुल चिंतित होकर पास आया –
राहुल: “तू ठीक है न? चल डॉक्टर को दिखा देते हैं।”
अमित (जल्दी से): “नहीं-नहीं! इतनी भी तबीयत खराब नहीं है। तू बस मेरी तरफ़ से हाज़िरी लगा देना।”
राहुल मान गया और कॉलेज चला गया।
लेकिन उसी दिन राहुल का एक दोस्त सुमित ने उसे कॉलेज कैफ़ेटेरिया में बताया –
सुमित: “अरे, आज तो मैंने अमित को मैदान में देखा था। वो लड़कों के साथ क्रिकेट खेल रहा था। तू कह रहा है वो बीमार है?”
राहुल चौंक गया।
राहुल: “क्या? तूने पक्का अमित को ही देखा?”
सुमित: “हाँ भाई, बिल्कुल पक्का। हाथ में बैट था और जोर-जोर से चिल्ला भी रहा था।”
ये सुनकर राहुल के दिल में हल्की-सी शंका की चिंगारी उठी। लेकिन अगले ही पल उसने खुद को समझा लिया –
“नहीं, हो सकता है सुमित ने गलत देखा हो। अमित मेरा सबसे अच्छा दोस्त है। वो झूठ क्यों बोलेगा?”
धीरे-धीरे अमित के नाटक बढ़ते चले गए। कभी बीमार, कभी चोटिल, कभी उदास। राहुल सब कुछ मान लेता। लेकिन राहुल की माँ ने कई बार देखा कि जब राहुल काम में पसीना-पसीना हो रहा होता, अमित आराम से मोबाइल चला रहा होता।
एक दिन माँ ने राहुल से कहा –
माँ: “बेटा, ये अमित हर काम तुझसे क्यों करवाता है? तू क्यों इतना भरोसा करता है उस पर?”
राहुल (मुस्कुराकर): “माँ, दोस्ती में गिनती नहीं होती। आज मैं कर रहा हूँ, कल वो करेगा।”
माँ चुप हो गईं, लेकिन उनके चेहरे पर चिंता साफ़ दिख रही थी।
राहुल का शक तब और गहरा हुआ जब कॉलेज में वार्षिक समारोह (annual function) की तैयारी शुरू हुई। राहुल ने डांस और एक्टिंग दोनों में नाम लिखा था। अमित ने भी एक्टिंग का नाम डाल दिया।
रिहर्सल के पहले ही दिन अमित बोला –
अमित: “भाई, मेरी तबीयत ठीक नहीं है। तू मेरी तरफ़ से भी डायलॉग बोल देना।”
राहुल ने बिना सवाल किए हामी भर दी। लेकिन उस शाम उसने देखा कि अमित कैंटीन में दोस्तों के साथ हँस-हँसकर गाने गा रहा था।
उस वक़्त राहुल का दिल ज़ोर से धड़का –
“तो क्या सुमित सच कह रहा था? क्या अमित मुझसे झूठ बोलता है? क्या उसकी सारी बीमारियाँ सिर्फ़ बहाना हैं?”
रात को राहुल देर तक सो नहीं पाया। उसके दिल में तूफ़ान मचा था।
- एक तरफ़ दोस्ती का रिश्ता था, जिसमें उसने सालों से भरोसा किया था।
- दूसरी तरफ़ सच का डर था, जो धीरे-धीरे सामने आ रहा था।
उसने मन ही मन ठाना – “अब मुझे असली बात जाननी ही होगी। अगर अमित मुझे धोखा दे रहा है, तो मैं चुप नहीं रहूँगा।”
राहुल के मन में अब गहरी बेचैनी थी। इतने सालों की दोस्ती पर उसे शक हो रहा था, लेकिन बिना सबूत के वो अमित से कुछ कह भी नहीं सकता था।
अगले दिन सुबह, राहुल जान-बूझकर बोला –
राहुल (गंभीर आवाज़ में):
“अमित, मेरी तबीयत थोड़ी भारी लग रही है। सिर दर्द है, शायद बुखार भी चढ़ जाए। आज तू कॉलेज चला जा।”
अमित ने एक पल को सोचा, फिर चेहरे पर नकली चिंता लाकर बोला –
अमित: “अरे यार, तू आराम कर। मैं तेरे बिना कहीं नहीं जाऊँगा।”
राहुल ने हल्की मुस्कान दबा ली। वो जान गया कि अगर अमित सच्चा दोस्त होता तो वो ज़िद करके कॉलेज चला जाता, लेकिन असल में तो वो खुद क्लास bunk करने का बहाना ढूँढ रहा था।
शाम को राहुल ने अपने दोस्त सुमित को फोन किया।
राहुल: “यार, तू ज़रा अमित पर नज़र रखना। मुझे शक है।”
सुमित मान गया।
अगले ही दिन सुमित ने खबर दी –
सुमित: “भाई, आज अमित कैंपस के मैदान में फुटबॉल खेल रहा था। और वो कह रहा था कि ‘राहुल तो बेवकूफ है, हर बार मेरे बहाने मान लेता है।’”
ये सुनकर राहुल का दिल टूट गया। दोस्ती की नींव जैसे ढह गई हो।
उस रात राहुल ने हिम्मत जुटाई और अमित से बोला –
राहुल (तेज़ आवाज़ में): “सच-सच बता, तेरी सारी बीमारियाँ नाटक हैं न?”
अमित चौंक गया, फिर हँसकर बोला –
अमित (मुस्कुराते हुए): “अरे भाई, इतना भी सीरियस मत हो। थोड़े-बहुत बहाने तो चलते हैं दोस्ती में। और वैसे भी, तू काम कर ही लेता है तो मुझे मेहनत क्यों करनी चाहिए?”
राहुल की आँखें नम हो गईं।
राहुल: “मतलब, तेरे लिए दोस्ती का मतलब सिर्फ़ मुझे इस्तेमाल करना है?”
अमित (बेदर्दी से): “देख भाई, दुनिया ऐसे ही चलती है। तू इमोशनल है, और मैं स्मार्ट हूँ। तू मेहनत करेगा और मैं मज़े करूँगा। इसमें ग़लत क्या है?”
ये सुनकर राहुल को जैसे किसी ने दिल में छुरा घोंप दिया हो। उसने बिना कुछ बोले अपना बैग उठाया और कमरे से बाहर चला गया।
रातभर राहुल सोचता रहा –
“क्या यही दोस्ती है? क्या मैं इतने सालों से एक नाटक का हिस्सा बना रहा?”
अगली सुबह राहुल आईने के सामने खड़ा होकर खुद से बोला –
राहुल (धीरे-धीरे):
“अब बहुत हो गया। मैंने उसे सच्चा दोस्त माना, लेकिन उसने मुझे मूर्ख समझा। अब मैं उसके नाटक का हिस्सा नहीं बनूँगा। अब वक्त है उसे उसकी असलियत दिखाने का।”
उसकी आँखों में पहली बार दृढ़ता थी।
राहुल ने ठान लिया था कि अब वो अमित के नाटक का अंत करेगा। लेकिन वह सीधा झगड़ा नहीं चाहता था। वो चाहता था कि अमित की असलियत सबके सामने खुद-ब-खुद आ जाएगा।
कॉलेज में वार्षिक समारोह की तैयारियाँ चल रही थीं। हर छात्र को कोई न कोई जिम्मेदारी दी गई थी। राहुल को मंच-प्रबंधन (stage management) का काम मिला, जबकि अमित को डांस ग्रुप में शामिल कर दिया गया।
अमित ने तुरंत नाटक शुरू किया –
अमित (झूठी खाँसी के साथ):
“भाई, मैं डांस कैसे करूँ? मुझे तो कमर में दर्द है। तू ही मेरी जगह कर दे न।”
राहुल मुस्कुराया। अबकी बार उसने हामी भर ली, लेकिन उसके दिमाग में एक योजना थी।
राहुल ने बाकी टीम से चुपचाप बात की। उसने कहा –
राहुल: “अमित को मत बताना, लेकिन मैं चाहता हूँ कि रिहर्सल के दौरान अचानक उसे मंच पर बुलाया जाए। तब असली खेल सामने आएगा।”
दोस्तों ने उसकी बात मान ली।
रिहर्सल के दिन सब तैयार थे। अमित आराम से कोने में बैठा था, मोबाइल पर चैट कर रहा था। तभी कोरियोग्राफर ने अचानक कहा –
कोरियोग्राफर: “अमित! तुम्हारी बारी है, आओ मंच पर।”
अमित हड़बड़ा गया।
अमित (हकलाते हुए): “म-म-मैं? नहीं सर, मेरी तबीयत…”
लेकिन सबके ज़ोर देने पर उसे मंच पर जाना पड़ा। जैसे ही संगीत बजा, अमित ने पूरे जोश से स्टेप करना शुरू कर दिया। कोई भी देखकर कह देता कि उसकी तबीयत बिल्कुल दुरुस्त है।
राहुल पीछे खड़ा सब देख रहा था। उसके चेहरे पर हल्की-सी जीत की मुस्कान थी।
रिहर्सल ख़त्म होने के बाद एक साथी छात्र बोला –
छात्र: “अरे अमित, अभी तो तू कह रहा था कमर में दर्द है। फिर इतना जोर-जोर से डांस कैसे कर लिया?”
बाकी सब हँसने लगे। अमित के चेहरे का रंग उड़ गया। उसने जल्दी से बात टालने की कोशिश की –
अमित (घबराकर): “अरे, बस अचानक जोश आ गया था। वरना मैं तो बीमार ही हूँ।”
लेकिन अब सबके मन में शक बैठ चुका था।
राहुल आगे आया और सबके सामने शांत स्वर में बोला –
राहुल:
“दोस्तों, सच्चाई ये है कि अमित हर बार बीमारी का नाटक करता है। मैंने सालों तक उसका काम किया, उसकी जिम्मेदारियाँ उठाईं। मैं समझता था ये दोस्ती है, लेकिन असल में ये सिर्फ़ नाटक था।”
पूरा हॉल खामोश हो गया। सबकी नज़रें अमित पर टिक गईं।
अमित गुस्से में बड़बड़ाया –
अमित: “राहुल, तूने मुझे धोखा दिया। तूने सबको मेरे खिलाफ कर दिया।”
राहुल ने दृढ़ आवाज़ में कहा –
राहुल: “नहीं अमित, धोखा तूने दिया है। मैंने दोस्ती निभाई, तूने उसका मज़ाक बनाया। आज तेरी असलियत सबके सामने है।”
अमित की आँखें भर आईं, लेकिन अब किसी को उस पर भरोसा नहीं रहा। उसके सारे दोस्त धीरे-धीरे उससे दूरी बनाने लगे।
राहुल मंच से नीचे उतरा और भीतर ही भीतर खुद से बोला –
“आज दोस्ती का नाटक ख़त्म हुआ। अब असली जिंदगी की शुरुआत होगी।”
रिहर्सल के बाद से ही सबका रवैया बदल गया था।
- जो दोस्त पहले अमित के साथ हँसते-बोलते थे, अब उससे कतराने लगे।
- कैंटीन में उसकी टेबल खाली रहने लगी।
- क्लास में कोई उससे नोट्स शेयर नहीं करता।
अमित को पहली बार एहसास हुआ कि वो अकेला पड़ गया है।
रात को कमरे में उसने राहुल को देखा, जो चुपचाप किताब पढ़ रहा था।
अमित धीरे-धीरे उसके पास आया और बोला –
अमित (धीमी आवाज़ में):
“राहुल… तुझसे एक बात कहनी है।”
राहुल ने किताब से नज़र हटाए बिना कहा –
राहुल: “कह।”
अमित (आँखें झुकाकर):
“मुझे माफ़ कर दे भाई। मैंने तुझे इस्तेमाल किया, झूठ बोले, बीमारी का नाटक किया। मैं खुदगर्ज़ निकला। लेकिन जब सबने मुझसे मुँह मोड़ लिया, तब समझ आया कि सच्चा दोस्त तू ही था।”
दिल का तूफ़ान
राहुल ने गहरी सांस ली। उसके दिल में दर्द भी था और नरमी भी।
वो बोला –
राहुल:
“अमित, दोस्ती का मतलब सिर्फ़ लेना नहीं, देना भी होता है। मैंने तुझे भाई माना, लेकिन तूने मुझे मूर्ख समझा। सोच, अगर मैं भी तुझसे हर बार झूठ बोलता, तो क्या तुझे अच्छा लगता?”
अमित की आँखों से आँसू निकल पड़े।
अमित: “नहीं राहुल, अब मैं समझ गया हूँ। मैंने गलती की है। प्लीज़ मुझे एक मौका दे।”
कुछ देर चुप रहने के बाद राहुल ने कहा –
राहुल (मुस्कुराकर):
“गलती हर इंसान से होती है। फर्क बस इतना है कि कोई मानता है और कोई छुपाता है। अगर तू बदलने का वादा करे, तो मैं आज भी तेरा दोस्त हूँ।”
अमित ने हाथ जोड़ दिए –
अमित: “मैं वादा करता हूँ। अबसे कोई नाटक नहीं, सिर्फ़ सच्ची दोस्ती।”
दोनों गले लग गए। कमरे का माहौल, जो कई दिनों से भारी था, अचानक हल्का हो गया।
समारोह वाले दिन राहुल और अमित दोनों ने मंच पर जाकर एक छोटा-सा भाषण दिया।
राहुल ने कहा –
राहुल:
“दोस्ती का मतलब सिर्फ़ साथ बैठना या हँसना नहीं है। असली दोस्त वही है जो मुसीबत में भी सच्चाई से खड़ा रहे। नाटक से बनी दोस्ती थोड़ी दूर तक चल सकती है, लेकिन सच्चाई से बनी दोस्ती ज़िंदगी भर रहती है।”
पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा।
अंत
उस दिन के बाद से अमित ने सचमुच मेहनत करना शुरू किया।
- वो खुद असाइनमेंट करता,
- घर के कामों में हाथ बँटाता,
- और सबसे बढ़कर, राहुल की भावनाओं की क़द्र करने लगा।
अब उनकी दोस्ती नाटक नहीं, बल्कि सच्चाई और भरोसे पर टिकी थी।
कहानी का संदेश:
👉 दोस्ती का असली मतलब है – भरोसा, सच्चाई और एक-दूसरे की क़द्र। अगर दोस्ती नाटक पर टिकी हो, तो वो ज़्यादा दिन नहीं टिकती।
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