मासूम बचपन और एक हादसा


✨ मासूम बचपन और एक हादसा 


रुहानी (कहानी की मुख्य किरदार) एक छोटे से कस्बे की साधारण लड़की थी।
उसके पापा एक छोटी-सी दुकान चलाते थे और माँ गृहिणी थीं। घर में ज्यादा सुख-सुविधा नहीं थी लेकिन प्यार बहुत था। रुहानी को पढ़ाई से बहुत लगाव था। बचपन से ही वह टीचर और पुलिस की ड्रेस पहनकर आईने में खड़ी हो जाती थी और कहती –

“मम्मी, एक दिन मैं भी वर्दी पहनूँगी और सबको सुरक्षित रखूँगी।”

माँ हंसकर उसका माथा चूम लेती थीं और कहतीं –

“बेटा, मेहनत करने वालों की कभी हार नहीं होती।”

उसकी ज़िंदगी में सब कुछ सामान्य ही चल रहा था। स्कूल में अच्छे नंबर लाना, दोस्तों के साथ खेलना, माँ की मदद करना – यही उसकी दिनचर्या थी।

लेकिन ज़िंदगी ने 16 साल की उम्र में ऐसा मोड़ लिया जिसने उसकी पूरी दुनिया बदल दी।

हादसा

स्कूल से लौटते वक्त एक दिन कुछ दरिंदों ने उसका रास्ता रोक लिया। मासूम रुहानी समझ भी नहीं पाई कि उसके साथ क्या होने वाला है। वह चिल्लाई, रोई, भगवान को पुकारा लेकिन उन दरिंदों की हैवानियत के सामने उसकी आवाज़ दब गई।

उस दिन उसकी इज़्ज़त लूट ली गई, उसके सपनों को रौंद दिया गया।

जब वह होश में आई तो खुद को खून से लथपथ पाया। शरीर से ज्यादा उसका मन टूटा हुआ था।


समाज का ज़हर

वह घर पहुँची तो माँ-बाप ने उसे सीने से लगा लिया, लेकिन बाहर की दुनिया ने उसे दोष देना शुरू कर दिया।
लोगों ने कहा –

  • “लड़की ने जरूर कपड़ों से उकसाया होगा।”
  • “इतनी रात को बाहर क्यों निकली थी?”
  • “अब कौन इससे शादी करेगा?”

रुहानी की आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। उसे लगने लगा था कि अब उसका जीवन यहीं खत्म हो गया है।

एक दिन उसने खुद से कहा –

“शायद मर जाना ही बेहतर है…!”

वह छत पर जाकर छलांग लगाने ही वाली थी कि अचानक माँ की आवाज़ आई –

“रुहानी… तू हमारी जान है, तू हार मत मान… अगर तूने खुद को खत्म कर लिया, तो जीत उन दरिंदों की होगी।”

माँ के आंसुओं ने उसे मौत के मुंह से खींच लिया।


नई कसम

उस रात उसने ठान लिया –

“अब मैं डर कर नहीं जीऊँगी। मैं उन जैसे दरिंदों को सज़ा दिलाने वाली बनूँगी। मैं पुलिस अफसर बनूँगी।”पर यह रास्ता आसान नहीं था।

संघर्ष और सपनों की जंग


उस रात के बाद रुहानी की ज़िंदगी पूरी तरह बदल चुकी थी।वह हर दिन एक ही सवाल करती –

> “भगवान, मैंने कौन-सा पाप किया था जो मुझे यह सहना पड़ा?”

लेकिन धीरे-धीरे उसने समझा कि भगवान उसके इम्तिहान ले रहे हैं। अगर उसने हार मान ली, तो दरिंदों की जीत होगी। और अगर वह खड़ी रही, तो लाखों औरतों की जीत होगी।

पढ़ाई की राह

रुहानी ने खुद को पढ़ाई में झोंक दिया। लेकिन समस्या यह थी कि उसका परिवार बहुत गरीब था। पापा की छोटी दुकान से घर का खर्च ही मुश्किल से चलता था।पुलिस अफसर बनने के लिए उसे कोचिंग चाहिए थी, किताबें चाहिए थीं, और वक्त भी।

पापा ने कहा –

> “बेटा, हमारे पास पैसे भले कम हों, लेकिन हौसले कभी कम नहीं होंगे। तू पढ़, मैं सब करूंगा।”

माँ ने अपने गहने तक बेच दिए ताकि बेटी को किताबें मिल सकें।लेकिन समाज चुप नहीं रहा। रिश्तेदार ताने देने लगे –

“अब पढ़ाई से क्या होगा? इसकी तो ज़िंदगी खत्म हो गई।”

“ऐसी लड़कियाँ घर की इज़्ज़त मिट्टी में मिलाती हैं।”रुहानी सुनती रही, लेकिन अब उसने एक कवच बना लिया था। वह सोचती –

> “जितना लोग मुझे तोड़ने की कोशिश करेंगे, उतना ही मैं मज़बूत बनूँगी।”

मानसिक संघर्ष


रात को पढ़ाई करते वक्त कभी-कभी वह अचानक किताब बंद कर देती और रोने लगती।उसे वो काली रात याद आ जाती। उसकी आत्मा चीख पड़ती –“क्यों हुआ  मेरे साथ?”लेकिन फिर वह शीशे में अपना चेहरा देखती और खुद से कहती –“रुहानी, तू कमज़ोर नहीं है। तू उन लड़कियों की आवाज़ है जो चुप हैं। अगर तू टूटी, तो सब टूट जाएँगी।”

मेहनत का सफर

सुबह 4 बजे उठकर वह दौड़ने जाती। क्योंकि पुलिस अफसर बनने के लिए शारीरिक ताक़त भी ज़रूरी थी।

गाँव के लड़के उस पर हँसते –“देखो, यह लड़की भी अब दौड़ेगी क्या?”“अरे, पुलिस अफसर बनेगी… हाहाहा।”

लेकिन रुहानी ने कभी जवाब नहीं दिया। उसका एक ही मंत्र था –

 “मेहनत की आवाज़ तब तक सुनाई नहीं देती, जब तक सफलता शोर न मचा दे।”

दिन में दुकान पर पापा की मदद करना, दोपहर में घर का काम करना, और रात को घंटों तक पढ़ाई करना – यही उसकी दिनचर्या बन गई।

पहला बड़ा झटका

कई साल की मेहनत के बाद उसने पहली बार पुलिस परीक्षा दी।लेकिन वह फेल हो गई।जब रिजल्ट आया, तो उसने चुपचाप अपने कमरे का दरवाज़ा बंद कर लिया और फूट-फूटकर रोई।

माँ ने दरवाज़ा खटखटाया –

 “बेटा, रो ले… लेकिन हार मत मान। हर बड़ी मंज़िल के लिए कई बार गिरना पड़ता है।”

पापा ने कहा

“अगर तू एक बार गिर गई, तो यह हार नहीं, यह सीढ़ी है।”उनके शब्दों ने उसके दिल में फिर से आग भर दी।

वह उठी और खुद से बोली –

> “अब मैं और ज्यादा मेहनत करूँगी। हार मानना मेरी किस्मत में नहीं है।”

समाज की ठंडी सांसें

समाज कह रहा था –

“देखा? पुलिस अफसर बनना आसान नहीं।”

“अब शादी कर दो इसे, वरना कोई लेगा भी नहीं।”

लेकिन इस बार रुहानी ने उन्हें नजरअंदाज कर दिया।

वह सोचती –

> “जिन्हें मेरी मंज़िल पर यकीन नहीं, एक दिन वही लोग मेरी जीत 

पर ताली बजाएँगे।”

रुहानी अब पहले से भी ज्यादा मज़बूत हो चुकी थी।

वह जानती थी कि मंज़िल आसान नहीं है, लेकिन उसका जज़्बा अब लोहे की तरह मजबूत हो गया था।


संघर्ष की आग


अब उसने दिन-रात का फर्क ही भुला दिया।

सुबह की ठंडी हवाओं में दौड़ना, दोपहर की तपती धूप में पढ़ाई करना और रात की खामोशी में किताबों में खो जाना – यही उसका जीवन बन गया।


कभी-कभी तो वह थककर गिर जाती, शरीर दर्द से कांपने लगता, लेकिन फिर माँ का चेहरा याद आता।

माँ ने जब गहने बेचे थे, तो कहा था –

> “मेरी बेटी अफसर बनेगी, ये मेरा विश्वास है।”उस विश्वास ने ही उसे बार-बार खड़ा किया।

आत्मविश्वास की लौ

इस बार उसने हर छोटी गलती को सुधारा।

पढ़ाई में ध्यान दिया, हर सवाल को बार-बार हल किया।

फिजिकल ट्रेनिंग के लिए गाँव से कई किलोमीटर दौड़ती।

लोग फिर हँसते, ताने मारते –

“अरे, फिर से कोशिश करेगी? पिछली बार भी फेल हो गई थी।”

“ऐसी लड़कियों का काम यही है, चार दीवारों में रहना।”

लेकिन अब रुहानी ने उनकी ओर देखना भी छोड़ दिया।

उसने ठान लिया था –> “इस बार या तो मैं जीतूँगी… या फिर मरते दम तक कोशिश करूँगी।”

परीक्षा का दिन


दूसरी बार जब पुलिस की परीक्षा का दिन आया, तो उसके हाथ काँप रहे थे।

लेकिन उसने आँखें बंद कीं और माँ की बातें याद कीं।> “बेटा, तू अकेली नहीं है। तेरे पीछे तेरी माँ का विश्वास, तेरे पापा की मेहनत और उस भगवान का आशीर्वाद है।”उसने पेपर हल किया। हर सवाल पर उसका दिल कह रहा था – “इस बार होगा… इस बार मैं सफल होऊँगी।”

रिजल्ट का इंतज़ार


दिन बीते, हफ्ते बीते… रिजल्ट आने वाला था।उसकी धड़कनें तेज़ थीं।पापा दुकान पर बैठे बार-बार अखबार देखते।माँ मंदिर में दीपक जलाकर प्रार्थना कर रही थीं।आखिरकार रिजल्ट आया।रुहानी ने काँपते हाथों से अपना रोल नंबर खोजा… और अचानक उसकी आँखों से आँसू बह निकले।

उसका नाम सूची में था।वह चुनी गई थी!

खुशी और संघर्ष का मिलनवह भागकर माँ-बाप के पास गई और चीखते हुए बोली –

> “माँ! पापा! मैं सफल हो गई… मैं पुलिस अफसर बन गई!”

माँ ने उसे गले से लगा लिया, पापा की आँखों में आँसू भर आए।

पापा ने कहा –

> “देखा, मैंने कहा था न? मेहनत करने वालों की कभी हार नहीं होती।”

लेकिन यह तो सिर्फ शुरुआत थी। अब उसे ट्रेनिंग से गुजरना था।

ट्रेनिंग का संघर्ष


पुलिस की ट्रेनिंग आसान नहीं थी।सुबह 4 बजे उठना, कठिन एक्सरसाइज़ करना, हथियार चलाना सीखना, कानून पढ़ना – सब कुछ उसके लिए नया था।कभी-कभी उसका शरीर जवाब दे देता।पैर सूज जाते, हाथ कांप जाते।लेकिन जब भी वह हार मानने लगती, उसके कानों में वो आवाज़ गूंजती –> “अगर तू टूटी, तो दरिंदों की जीत होगी।”

वह अपने आँसू पोंछती और और भी जोर से दौड़ती।एक और इम्तिहानट्रेनिंग के दौरान एक बार इंस्ट्रक्टर ने कहा –> “इस बैच में जो कमजोर साबित होगा, वह बाहर हो जाएगा।”

सबकी नज़रें रुहानी पर टिक गईं। लोग फुसफुसाए –

“यह लड़की कहाँ टिक पाएगी?”

“इसकी हिम्मत नहीं कि ये सब झेल पाए।”

लेकिन रुहानी ने अपने अंदर की आग को बाहर निकाल दिया।

वह सबसे आगे दौड़ी, सबसे कठिन टास्क पूरे किए।

और आखिर में इंस्ट्रक्टर ने खुद कहा –

> “यह लड़की किसी से कम नहीं है। असली पुलिस अफसर ऐसे ही बनते हैं।”

जीत की पहली झलक


जब ट्रेनिंग पूरी हुई और रुहानी ने पहली बार पुलिस की वर्दी पहनी, तो उसकी आँखों में आँसू थे।

वह आईने के सामने खड़ी होकर बोली –> “देखो, दरिंदों… तुमने सोचा था कि मैं टूट जाऊँगी। लेकिन आज मैं वही वर्दी पहन चुकी हूँ जो तुम्हें सज़ा दिलाएगीरुहानी अब पुलिस अफसर बन चुकी थी।उसने वो वर्दी पहन ली थी जिसके सपने उसने बचपन में देखे थे।लेकिन असली जंग अभी बाकी थी – समाज को जवाब देना और उन दरिंदों को सज़ा दिलाना।

पहला दिन वर्दी में

जब उसने पहली बार पुलिस स्टेशन में कदम रखा, तो सबकी नज़रें उस पर थीं।

लोग फुसफुसा रहे थे –“क्या यह वही लड़की है…?”

“हां, वही… लेकिन अब देखो, अफसर बन गई।”

रुहानी ने गहरी सांस ली और खुद से कहा –

> “आज से मेरी लड़ाई और बड़ी हो गई है।”


समाज का सामना

वही लोग जो कभी ताने देते थे, अब उसके पास आकर कह रहे थे बेटी, हमें तुम पर गर्व है।”“तुमने तो पूरे गाँव का नाम रोशन कर दिया।”

लेकिन रुहानी बस मुस्कुराती रही।

वह जानती थी कि अगर उसने हार मानी होती, तो यही लोग उसे “बोझ” कहते।

दरिंदों को सज़ा

वर्दी पहनने के बाद उसका पहला मिशन था – अपने साथ हुए गुनाह का केस दोबारा खोलना।

वह सीधे कोर्ट में खड़ी हुई और बोली – “मैं सबूत हूँ। मैं गवाह हूँ। और अब मैं अफसर भी हूँ। दरिंदों को सज़ा मिलनी ही चाहिए।कई महीनों की लड़ाई के बाद आखिरकार वे दोषी जेल भेजे गए।

जज ने फैसला सुनाते वक्त कहा –

“आज यह फैसला सिर्फ एक लड़की की जीत नहीं है, बल्कि उन तमाम बेटियों की जीत है जिनकी आवाज़ दबा दी जाती है।”



प्रेरणा की किरण

जब यह खबर अखबारों और टीवी पर आई, तो देशभर की लड़कियाँ उसकी कहानी पढ़कर रो पड़ीं।

कई औरतों ने कहा –

“अगर रुहानी कर सकती है, तो हम भी कर सकते हैं।”“उसने साबित कर दिया कि औरत टूटी नहीं है, बल्कि पहाड़ से भी ज्यादा मजबूत है।”रुहानी अब लड़कियों के लिए रोल मॉडल बन चुकी थी



                                                 कहानी का क्लाइमेक्स

एक दिन वही गाँव, वही रास्ता जहाँ कभी उसका बचपन टूटा था…अब उसी जगह रुहानी वर्दी पहनकर खड़ी थी।

उसने आसमान की ओर देखा और कहा –

> “भगवान, मैंने वादा निभा दिया। मैं टूटी नहीं, मैं बनी हूँ – लाखों औरतों की हिम्मत।”

उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे लेकिन इस बार ये आँसू दर्द के नहीं, गर्व के थे 


अंत का संदेश

रुहानी ने अपनी डायरी में आखिरी पन्ने पर लिखा –

 “ज़िंदगी हमें तोड़ने की कोशिश जरूर करती है। लेकिन जो लोग टूट

कर भी खड़े हो जाते हैं, वही इतिहास लिखते हैं। अगर मैं कर सकती हूँ, तो हर बेटी कर सकती है। बस हार मत मानो।”

                                                                                                                                   THANK YOU 

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